... कल उमड़ी थी मिट आज चली...
सन् 1982 के करीब की बात है। तब मैं साप्ताहिक स्वराज्य व दैनिक स्वराज्य टाइम्स के संपादक मंडल में था। साहित्य ही मेरा प्रिय विषय था।अतः इस प्रकार आलेख लिखना व संपादन किया करता था।देश भर की पत्र-पत्रिकाओें का पढ़ने में रुचि भी थी। परम पूज्य महादेवी वर्मा जी के प्रति अटूट श्रद्धा थी। पाठ्यक्रमों में मैंने उनको पढ़ा था। तब बहुत बड़े साहित्यकार भी संपादक के नाम पत्र लिखने में संकोच नहीं करते थे।एक दिन साप्ताहिक हिंदुस्तान में पूज्य महादेवी वर्मा जी का युवाओं पर एक पत्र प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने यह लिखा था कि बेरोजगारी के कारण ही युवा अपराध की दुनिया में जा रहा है।
मुझे पढ़ कर अच्छा नहीं लगा। मैंने पूरी श्रद्धा के साथ, पूज्य महादेवी जी से क्षमा याचना सहित एक पत्र साप्ताहिक हिंदुस्तान के पत्र कालम के लिए ही लिखा।उसमें मैंने उनकी बात का विरोध किया। लिखाकि यदि कोई युवक बेरोजगार है तो क्या वह अपराध की दुनिया में चला जाएगा। रोजगार के लिए अन्य उपाय है। अपराध की दुनिया में रोजगार युवक भी जा सकते हैं। मैंने लिखा कि युवाओं नकारात्मक सोच की नहीं, सकारात्मक सोच की जरूरत है।
वह पत्र साप्ताहिक हिंदुस्तान ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। (मुझ पर इसका कोई प्रमाण नहीं है)
11 सितंबर 1987 को स्वराज्य टाइम्स कार्यालय में बैठा था। ट्रांजिस्टर पर समाचार सुन रहा था। अचानक समाचार आया,महादेवी जी का निधन हो गया। मैं स्तब्ध रह गया। हिंदी साहित्य का बहुत बड़ा नुकसान था। मेरी आंखें छलछला गई। मेरे दिमाग में उन्हीं की कविता की दो पंक्तियां बार-बार तैर रही थीं-..कल उमड़ी थी, मिट आज चली। तभी मैंने उनका समाचार स्वराज्य टाइम्स के लिए लिखना शुरू किया। उनके परिचय के साथ साहित्यिक यात्राऔर देहावसान पर शोक। आगरा के कुछ साहित्यकारों की ओर से श्रद्धांजलि भी लिखी । मैंने हैडिंग लगाया था---कल उमड़ी थी मिट आज चली। यह समाचार प्रकाशित हुआ। दूसरे दिन प्रेस जाकर जब मैंने दिल्ली के समाचार पत्र देखे तो उनमें भी यही शीर्षक था। मुझे बहुत अच्छा लगा। यानि मुझे लगा कि मेरी सोच भी वही थी जो दिल्लीा के पत्रकारों की रही होगी।
आज महादेवी जी की जयंती है। मुझे यह स्मृतियां आज ताजा हो गईं। उनकी जयंती पर मैं उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन करता हूं।