Thursday, July 14, 2022
सावन में नियमित करें शिव मंदिरों के दर्शन *पूरे देश में छाया गीत "आगरा हमारा अभिमान"* ताजनगरी आगरा के पर्यटन को प्रोत्साहित करने और सांस्कृतिक गौरव को देश-दुनिया तक पहुँचाने के उद्देश्य से *आगरा विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र पेंसिया की अनूठी पहल* को हर ओर सराहना मिल रही है। डॉ. राजेंद्र पेंसिया के सौजन्य और *वरिष्ठ पत्रकार व साहित्य सेवी आदर्श नंदन गुप्ता* के सहयोग से तैयार आगरा का गीत "आगरा हमारा अभिमान" पूरे हिंदुस्तान में छाया हुआ है। यूट्यूब, फेसबुक और व्हाट्सएप सहित सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों से इस गीत को सैकड़ों लोगों द्वारा सुना, देखा और सराहा जा रहा है। आगरा के *लाड़ले कवि कुमार ललित* द्वारा रचित आगरा के इस गीत पर निर्मित वीडियो का निर्देशन फिल्म निर्देशक नारायण चौहान (मुंबई) ने किया है। उन्होंने इस वीडियो में गीत के बोलों के अनुसार आगरा के मंदिरों, रास्तों, ऐतिहासिक इमारतों, घाटों, धर्म स्थलों, उत्सवों, मेलों, बाजारों और लोगों को बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया है। इस गीत को नानू गुर्जर, लता सिंह और मयूरा दत्ता ने स्वर दिया है। संगीत मयूरा दत्ता का है। कृपया इस वीडियो को अधिक से अधिक *शेयर कीजिए, कमेंट व लाइक* कीजिए।
Saturday, February 12, 2022
मेरी यादों मेंकाका हाथरसी
जिंदगी को वक्त के सांचे में ढाल कर
मुस्कुराओ मौत की आंखों में आंख डाल कर।
जिदंगी के इस मूलमंत्र को मानने वाले काका हाथरसी खुद अपने जीवन में हंसे ही नहीं बल्कि अपनी रचनाओं से इस देश और दुनिया को जमकर ठहाके लगवाए। वे हिंदी के पहले एेसे कवि थे जिन्होंने हास्य रस की कविताओं को मंच पर लोकप्रियता प्रदान की। हास्य कविताओं को मान सम्मान दिलवाया।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर हाथरस के निवासी काका हाथरसी का मूल नाम प्रभु दयाल गर्ग था। काका ने करीब 70 वर्ष तक काव्य साधना की।45 वर्ष तक विभिन्न काव्य मंचों पर लोकप्रियता के शिखर पर रहे। कला रत्न की उपाधि से अलंकृत काका हाथरसी को सन् 1985 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने हास्य व्यंग्य की रचनात्मक साहित्य की 42 पुस्तकें लिखीं।
काव्य के अलावा संगीत जगत भी काका को हमेशा याद रखेगा। उन्होंने 1932 में हाथरस में ही संगीत कार्यालय की स्थापना की। इसके तहत संगीत पर करीब 150 महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुए। उन्होंने 1934 में संगीत नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, जो हिंदी के सबसे पुरानी मासिक पत्रिका के रूप में लोकप्रिय है। जो उनके निधन के बाद अभी भी प्रकाशित हो रही है।जिसे उनके पुत्र लक्ष्मीनारायन गर्ग संभाले हुए हैं।
काका ने बाद में फिल्म संगीत और म्यूजिक मिरर नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी शुरू किया था। उन्होंने बसंत छद्म नाम से संगीत विशारद पुस्तक भी लिखी, जो अाज भी विश्व विद्यालयों में सबसे ज्यादा पढ़ायी जाने वाली पुस्तक मानी जाती है। बहुत कम लोगों को मालुम है कि काका एक बहुत अच्छे चित्रकार भी थे। उन्होंने करीब 150 तेल चित्र बनाए, जिनमें अनेक चित्र शास्त्रीय संगीत के पुराने उस्तादों के हैं।
काका ने सन् 1975 में काका हाथरसी पुरस्कार की शुरुआत की, जो आज भी प्रतिवर्ष दिया जाता है। जिसे विख्यात कवि अशोक चक्रधर संभाले हुए हैं। काका हिंदी के पहले कवि थे, जिनकी निजी काव्य गोष्ठियां कई कई बार थाईलैंड, इंग्लैंड, सिंगापुर, अमेरिका, कनाडा आदि देशो में हुईं। अमेरिका के मेयर वाल्टीमोर ने सन् 1984 में उन्होंने आनरेरी सिटीजन शिप देकर सम्मानित किया था।
कविता का प्रमुख पात्र थ काकी
काका में हास्य कविता के बीज तो विवाह से पूर्व ही प्रस्फुटित हो गए थे। अपनी कविताओं में वे भावी पत्नी को लक्ष्य बनाकर कविता करते थे। विवाह के बाद में उनकी पत्नी काकी (रतनदेवी) उनकी प्रिय पात्र बन गई थीं। उनकी एक कविता काफी लोकप्रिय हुए,
काकी जब से घर आई है, ,
पिचके काका के गाल सखे..
मैके जाने का नोटिस देकर मुझको नित्य डराती है।
लेकिन मोटर के अड्डे से वापस घर को आती है।
भय के मारे मन ही मन,
देता रहता हूं ताल सखे,
मत पूछो मेरा हाल सखे।
दाढ़ी को अपना प्रमुख आकर्षण मानते हुए काका सुनाते थे
पहली दौलत मानिए हास्य व्यंग्य का ज्ञान,
दूजी दाढ़ी मानिए, तीजी काकी मान।
इसी प्रकार की एक और कविता लोकप्रिय रही
काका दाढ़ी राखिए, बिन दाढ़ी सब सून,
ज्यों मंसूरी के बिना व्यर्थ है देहरादून,
व्यर्थ है देहरादून, इसी से नर की शोभा,
दाढ़ी से ही प्रगति कर गए संत विनोबा।
मुनि वशिष्ठ यदि दाढ़़ी मुंह पर नहीं रखाते,
तो क्या वे भगवान राम के गुरु बन जाते।
जन्म,मरण एक ही दिन
एेसा मौका शायद ही किसी संत और महंत को मिला होगा, जिनके जन्म और मरण की तारीख एक ही हो। काका हाथरसी का जन्म 18 सितंबंर 1906 और निधन 18 सितंबर 1995 को हुआ था।
उंट गाड़ी पर निकाली थी उनकी शवयात्रा
काका की वसीयत के अनुसार उनकी शवयात्रा उंट गाड़ी में निकाली गई थी। और लोग हंसते, गाते कविता सुनाते, ठहाके लगाते शामिल हुए थे। श्मशान घाट पर श्रद्धाजंलि सभा के बजाए हास्य काव्य गोष्ठी हुई थी।