Thursday, July 25, 2024

लता मंगेशकर: मेरा सुंदर सपना टूट गया

लता मंगेशकरः मेरा सुंदर सपना टूट गया...
35 वर्षीय हिंदी पत्रकारिता में मैंने अनगिनत शख्सियतों के दर्शन किए, साक्षात्कार लिए, पर मेरी इच्छा थी कि एक बार आदरणीय लता मंगेशकर जी के भी दर्शन हो जाएं,  क्योंकि आदरणीय आशा भोसले जी से मेरी मुलाकात तो आगरा आगमन पर हो चुकी थी।मेरी मुख्य धारा की पत्रकारिता यानि 1991 के बाद उनका शुभागमन आगरा में नहीं हुआ, इसलिए उनसे मेरा मिलना नहीं हो पाया। 30 अगस्त सन् 2014 में मुझे संपत्ति ग्रुप राजकोट व एमफारयू के अश्वमेधा सम्मान के लिए भाई  श्री दुष्यंत प्रताप सिंह ने मुंबई आमंत्रित किया। तब मैंने काफी प्रयास किए उनसे मिलने के लिए। अपने राजश्री प्रोडक्शन के अपने मित्र के माध्यम से उन्हें पत्र भिजवाया। मुलाकात की बात भी हो गई। फिल्म कलाकार राजन यानि चार्ली चैप्लिन मेरे साथ थे। जब मैंने उनके आवास  पर फोन किया तो उसे लता मंगेशकर जी की बहन उषा मंगेशकर जी ने रिसीव किया। उन्होंने तब बताया कि उनका स्वास्थ्य अचानक खराब हो गया है। वे एक सप्ताह तक नहीं मिल सकती हैं। अतः भारी मन से हम उनसे बिना मिले, मुंबई से वापस लौट आए थे। 
उसके बाद से लगातार मेरा प्रयास रहा कि किसी तरह से उनसे मुलाकात हो जाए, लेकिन सफलता नहीं मिली। आज जब उनके निधन का समाचार मिला तो बहुत दुख हुआ। भगवान उनकी आत्मा को परम शांति प्रदान करें। बस उनका गाए गीत की यह पंक्तियां बार-बार याद आ रही हैं-जाने वाले से मुलाकात ना होने पाई...। 
आदर्श नंदन गुप्ता

स्वाधीनता सेनानी मुनि बाबूलाल मितल


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एक विधायक, जो त्यागपत्र देकर बन गए थे मुनि
इन्हीं के आमंत्रण पर कई बार आगरा आए थे श्री हरिवंशराय बच्चन

पूरे देश में शायद ही कोई एसा उदाहरण होगा कि विधान सभा से त्यागपत्र देकर कोई विधायक मुनि बन जाए। राजनीतिक सुखों को तिलांजलि देकर समाजसेवा को समर्पित हो जाएं। आगरा के विधायक बाबूलाल मीतल ने एसा उदाहरण पेश किया था।

चित्तीखाना निवासी श्री बाबूलाल मीतल का परिवार व्यावसायिक था, लेकिन उनकी रुचि व्यवसाय में नहीं थी। वे उन्होंने अधिवक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। इसके साथ ही सन् 1915 में महात्मा गांधी के संपर्क में आकर स्वाधीनता आंदोलन में कूद गए। सभी आंदोलनों में भाग लेने लगे थे और व्यक्तिगत सत्याग्रह में सन् 1941 में पहली बार जेल गए थे।

    9 अगस्त 1942 को देश भर में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। 10 अगस्त को चुंगी के मैदान में जो विशाल सभा हुई, उसकी अध्यक्षता भी मीतल जी ने की थी। इस आंदोलन में एक युवक परशुराम शहीद हुए थे। अन्य स्वाधीनता सेनानियों के साथ मीतल जी भी इस आंदोलन में जेल गए थे। उनके साथ जेल में जो अन्य कैदी थे, उनमें श्री शंभूनाथ चतुर्वेदी, श्री गणपति चंद्र केला, बटेश्वर के श्री लीलाधर वाजपेई प्रमुख थे। मीतल जी जेल में ही गीता प्रेस के कल्याण का अध्ययन करते थे।

आजादी के बाद सन् 1952 में भी प्रथम विधानसभा के चुनाव हुए। उसमें कांग्रेस ने उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ाया। चुनाव में उनके प्रचार का तरीका अलग ही रहता था। अपने विरोधियों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते। उन्होंने किसी से चंदा नहीं लिया, जो खर्च करना चाहते थे, उन्हीं से प्रचार आदि में खर्चा करा लिया करते थे। चुनाव में किसी वाहन का प्रयोग नहीं किया, केवल पदयात्रा ही की।

चुनाव में वे भारी मतों से विजयी हुए थे। विधानसभा में 431 विधायकों में से केवल पचास ही गैर कांग्रेसी थे। मुख्यमंत्री श्री गोविंद बल्लभ पंत थे।   विधानसभा की पब्लिक एकाउंटस कमेटी और जनरल एडिमिनिस्ट्रेशन कमेटी का सदस्य मीत्तल जी को बनाया गया था।

सब सुख थे, लेकिन उन्हें कोई रास नहीं आ रहा था। वे

चुनाव जीतने से पूर्व ही वे आचार्य विनोबा भावे और उनके आंदोलन से प्रभावित हो चुके थे। उनकी पुस्तकें पढ़ते।  27 अक्टूबर सन् 1951 को जब भूदान आंदोलन की यात्रा ने आगरा जिला में प्रवेश किया, तब पहला पड़ाव जाजऊ गांव था। यहीं पर श्री बाबूलाल मीतल ने उनके पहली बार दर्शन किए थे। यही वजह थी कि राजनीति में अरुचिकर लगने लगी।

    30 जनवरी 1955 को जीवनदान पत्र लिखा और विधानसभा से त्यागपत्र दे दिया। विनोबा जी की शरण में चले गए। विनोबा जी ने उन्हें आदिवासियों  की सेवा में उड़ीसा भेज दिया। सन् 1960 में जब बागियों ने समर्पण किया था, तब विनोबा जी के आदेश पर मीतल जी ने बागियों की कानूनी सहायता भी की। 1980 में ब्रह्मविद्या मंदिर, पवनार आश्रम में विनोबा जी के साथ उनके परम शिष्य के रूप में रहने लगे। 24 जून 1988 को उनका निधन हो गया था।  

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जीवन में कोई पेंशन ग्रहण नहीं की

गांधीवादी श्री शशि शिरोमणि जी के अनुसार मित्तल जी का जन्म सन् 1900 में रोशन मोहल्ला में लाला केदारनाथ के घर हुआ था। पिताजी जी की जौहरी बाजार में कपड़े की दुकान थी। जब बाबूलाल जी तीन साल के थे, तभी पिताजी का निधन हो गया। पालन पोषण बाबा लाला बांकेलाल ने किया। सन् 1918 में विक्टोरिया  स्कूल से इन्होंने हाईस्कूल पास किया। इलाहाबाद से बीए करने के बाद आगरा कालेज में 1926 में विधि  स्नातक की डिग्री ली और फिर अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस करने लगे थे। इन्हीं दिनों वे यूनाइटेड प्रेस आफ इंडिया के स्थाई प्रतिनिधि बन गए और आगरा के समाचार इस न्यूज एजेंसी को भेजने लगे थे।                      

1919 में मित्तल जी कि विवाह कस्तूरी देवी से हुआ, लेकिन आठ साल बाद ही पत्नी का विछोह हो गया। इनके आमंत्रण पर हरिवंश राय बच्चन कई बार आगरा आए थे और मधुशाला सहित कई रचनाएं सुनाई थीं।  बांकेबिहारी के भक्त थे और नियमित दर्शन करने जाते थे। स्वाधीनता संग्राम सेनानी व विधायक पद की कोई पेंशन नहीं ली।

अमर उजाला,आगरा में कान्हा के मंदिर सीरीज की आज दूसरी किस्त।

Tuesday, July 23, 2024

संसमरण 9,,, ताजमहल से टकरा कर आ रही थी जगजीत सिंह की गजल

*संस्मरण 9*

ताजमहल से टकरा कर आ रही थी जगजीत सिंह की गजलें

अनुपम सौंदर्य का प्रतीक ताजमहल, उसके पास बसा शिल्पियों का एक गांव (शिल्पग्राम)। हर साल की तरह यहां ताजमहोत्सव का आयोजन हो रहा था। संभवतः वर्ष 1994 की बात है, अन्य कलाकारों के बाद मखमली आवाज के जादूगर गजल गायक जगजीत सिंह का कार्यक्रम रात 11 बजे करीब शुरू हुआ। उन्होंने अपनी गजलों से हर श्रोता का मन मोह लिया। प्रांरभिक दौर में उन्होंने अपनी हल्की-फुल्की गजलें सुनाईं। मध्यांतर करीब 12 बजे हुआ। उसके बाद जो लोग उनके नाम की वजह से आए थे वो तो चले गए, लेकिन जो वास्तव में गजल प्रेमी थे, वे वहां रुके रहे, उनकी संख्या भी काफी थी। मध्यांतर के बाद उन्होंने अपनी गजल पेश की, श्रोता झूम उठे। सुर माहौल में गुंज रहे थे। लग रहा था, जैसे आधा किलोमीटर दूर ताजमहल के गुंबद से उनके सुर लौट कर आ रहे हों। इस दौरान उन्होंने सुनाया था- *चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले*। इस गजल की दो लाइनों को उन्होंने अलाप लेकर गाया, जैसे कि वे मुमताज और शाहजहां की कब्रों तक अपनी बात पहुंचाना चाहते हों-

*दिल ने एक ईंट सा तामीर किया ताजमहल*

*तूने एक बात कही, लाख फसाने निकले*
 अपनी प्रस्तुति का समापन उन्होंने बात दूर तलक जाएगी गजल से किया था।  

जगजीत सिंह को ताजमहल उसके इस शहर से बेपनाह मुहब्बत थी। कहते थे कि ताजमहल उन्हें खींच कर ले आता है। ताजमहल पर उनकी ये गजल बहुत लोकप्रिय रही।

*इतिहास की होठों पर मुहब्बत की गजल है,*

*ये ताजमहल है, ये ताजमहल है*

ताजमहल के इस नगर में उनकी पहली प्रस्तुति होटल क्लार्क शिराज में वर्ष 1980 में हुई थी। तब वे अपनी पत्नी चित्रा के साथ आए थे। उसके बाद तो ताजमहोत्सव में कई बार उनके कार्यक्रम हुए।

मियां नजीर और मिर्जा गालिब बहुत पसंद थे। वे अपनी कार्यक्रमों की प्रस्तुति से पहले उनका जरूर स्मरण करते थे। आज भी आगरा वासी उनके पुरानी यादों को ताजा करते हैं।

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*भड़क उठे थे व्यवधान पर*

जगजीत सिंह ही मेरी हर बार मुलाकात हुई, साक्षात्कार लिए, बहुत ही सजह और सरल हृदय थे। एक बार किसी क्लब ने जगजीत सिंह संध्या का आयोजन एक फाइव स्टार होटल में किया था। उन्होंने किसी को खबर तक नहीं की। हमें अचानक पता चला तो मैं और फोटो जर्नलिस्ट ब्रिजेश सिंह पहुंचे। रात भी बहुत हो चुकी थी, यह डर था कि कहीं उनका कार्यक्रम समाप्त ही न हो रहा हो। ब्रिजेश जी ने वहां पहुंच कर तड़ात़ड़ फोटो खींच डाले उनके सामने खड़े हो कर। वे भड़क उठे, गाना बंद कर दिया। बोले पहले तुम फोटो ले लो। जब उन्हें परिचय दिया और क्षमा याचना की, तब उन्होंने फिर से अपना कार्यक्रम शुरू किया था।

जगजीत सिंह जी की जगह आज तक कोई नहीं ले सका। उनकी गजलों का जो चयन होता था, वह गजब था। उनकी आवाज दिल में उतरती जाती थी। मैं उनकी पुण्यतिथि पर नमन करता हूं।

गुमनाम क्रांतिकारी शंभूनाथ आजाद

गुमनाम क्रांतिकारी.....
शंभूनाथ आजाद के खौफ से कांप उठा था मद्रास का अंग्रेज गर्वनर 
बम और पिस्तौल के साथ पहुंचे थे उसका वध करने
ऊटी में बैंक में डाली थी डकैती, लूटे थे एक लाख रुपये
--प्रस्तुति-आदर्श नंदन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार


भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में काकोरी कांड, कानपुर कांड, मेरठ कांड, लाहौर कांड आदि घटनाएं विख्यात रहीं, उसी प्रकार उटी मद्रास बम कांड मशहूर है, जिसके नायक शंभूनाथ आजाद आगरा की तहसील बाह में कचौराघाट के थे, जो मद्रास के गवर्नर को बमों से उड़ाने अपने साथियों के साथ पहुंच गए। उन्हें भले ही सफलता नहीं मिली, लेकिन अंग्रेज सरकार उनसे इतनी आतंकित हो गई कि उन्हें कालेपानी की सजा दी। कई बार वे जेल गए। सब कुछ सहा। आजादी के बाद उन्होंने अपनी शेष जिदंगी अपने गांव कचौरा घाट में ही बिताई। 
बड़ी विचित्र और जौहरशाली दास्तां है शंभूनाथ आजाद की। 26 जनवरी सन् 1908 में जन्मे आजाद जब आठ वर्ष के थे, तभी उनके पिता शंकर लाल रिछारिया व माताजी का देवलोक गमन हो गया। वे काम की तलाश में पंजाब चले गये। वहां उनकी मुलाकात क्रांतिकारियों से हुई और वे उनके संगठन हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ और अनुशीलन समिति के सदस्य बन गए। वे दिल्ली में विभिन्न राज्यों से अस्त्र-शस्त्रों  का संकलन करते थे। हथियारों को बुलंदशहर ले जाते समय पुलिस ने पकड़ लिया। दो साल की सजा हो गयी थी।
 बोस्टर्न जेल में इन्होंने सिविल एंड मिलट्री गजट समाचार पत्र में मद्रास के गोरे गवर्नर का बयान पढ़ा-“इस प्रांत की जनता राजभक्त है, इसलिए क्रांतिकारियों की दाल नहीं गलती”। 
इसे पढ़ कर आजाद बौखला गए और मद्रास के गवर्नर को उड़ाने की योजना बना ली। योजना बनी ही थी कि मनोली कांड (अंबाला केस) में प्रमुख अभियुक्त बना कर उन्हें जेल भेज दिया। मुकदमे में आजाद बरी हो गए। इसके बाद वे मद्रास के गवर्नर का वध करने के लिए फिर सक्रिय हो गए। तीन अच्छी क्वालिटी के रिवाल्वर खरीद ली। नौ साथियों के साथ  ये अपने लक्ष्य पर रवाना हो गए। 
धन की कमी को पूरा करने के लिए वे और उनके साथी ऊटी पहुंचे, यहां पर मैन मार्केट में ऊट कमांड नेशनल बैंक में डकैती डालकर एक लाख से अधिक रूपया लूट लिया। रुपये लेकर मद्रास पहुंचे, लेकिन उनके नौ साथियों में चार साथी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिये।  
संकट पर संकट आते गए, लेकिन आजाद का लक्ष्य निर्धारित था। मुखबिर और सीआईडी ने मद्रास में यह खबर दे दी थी कि गर्वनर एंडरसन और वहां पहुंचे बंगाल के गर्वनर को गोलियों और बमों से उड़ा दिया जाएगा। आजाद और उनके साथियों ने बहुत सारे बम तैयार कर लिए थे। पुलिस के तीन सौ जवानों ने धावा बोल दिया। उनमें और क्रांतिकारियों में जम कर संघर्ष हुआ। जब सारे बम और गोलियां खत्म हो गई तो धूएं वाला बम चलाकर ये क्रांतिकारी वहां से फरार हो गए। इस कांड में उनके एक साथी गोविंदराम बहल गोली लगने से शहीद हो गए। कुछ समय बाद आजाद सहित अन्य सभी साथी गिरफ्तार कर लिए  गए। 
सात जुलाई 1933 को स्पेशल जज गोविंद मैनन की अदालत में आजाद व उनके साथियों को पेश किया गया। इन सहित पांच साथियों पर ऊटी बैंक डकैती का मुकदमा  चला। आजाद को 25 साल की सजा हुई।  9 अगस्त 1933 को मद्रास सिटी बम कांड में इन्हें व दो क्रांतिकारियों  को 20-20 साल के काले पानी की सजा हो गई। लेकिन 1938 में अन्य क्रांतिकारियों के साथ आजाद को भी रिहा कर दिया गया था। इसके बाद भी वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे। जेल जाते, उत्पीड़न सहते। फिर छूट जाते। यही क्रम भारत के आजाद होने तक चलता रहा। जिन साथियों ने इनके साथ क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लिया, उनमें रामचंद्र भट्ट, नरेंद्र पाठक, लज्जाराम, आनंद स्वरूप, सियाराम आदि थे। एक साथी रोशनलाल बम परीक्षण में विस्फोट हो जाने से शहीद हो गए थे।  12 अगस्त 1985 शंभूनाथ आजाद इस संसार से विदा हो गए। 
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गांव में बनाया शहीद स्मारक
आजादी के बाद शंभूनाथ आजाद अपने गांव लौट आए। सरकार ने जो पेंशन दी, उससे उन्होंने ही शहीद स्मारक बनवाया। उसमें शहीदों के चित्र लगाए। बाह में इनकी स्मृति में शासन ने एक अस्पताल भी बनवाया है। 
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वर्जन 
 आजाद जी के बारे में देश के तमाम क्रांतिकारियों ने लिखा है। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने भी अखंड ज्योति पत्रिका के स्वाधीनता दिवस विशेषांक में आजाद जी के बारे में अपने विचार लिखे थे। 
 --श्रीकृष्ण शर्मा, भतीजे
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मुझे गर्व होता है जब मेरे बाबा की वजह मुझे स्कूल, कालेज व अन्य जगह सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। बाबा ने जो देशभक्ति पूर्ण कार्य किए, वे हम सबके लिए ही नहीं, हम जैसे सभी युवाओं के लिए प्रेरणाप्रद होंगे। 
शिवा शर्मा, पौत्र 
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शंभूनाथ हमारे गांव के दो बार प्रधान चुने गए। वे देश के विकास के साथ-साथ अपने गांव के विकास की चिंता करते थे। उन्होंने समाज को जो दिया, वो शायद ही कोई दे पाए।
-शिशुपाल सिंह यादव, सेवानिवृत रोडवेज कर्मी

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आदर्श नंदन गुप्ता, मोबाइल नंबर 9837069255

Saturday, July 20, 2024

गोपाल दास नीरज

अमर उजाला में
19 जुलाई 2024 को नीरज की पुण्य तिथि पर प्रकाशित

‘…जैसा अपना आना प्यारे, वैसा अपना जाना रे।‘ 
आगरा के सांस्कृतिक धरातल को लगाए थे पंख
-अभिनेत्री मीना कुमारी नाइट सहित कई फिल्मी हस्तियों के कराए थे आयोजन
-देश का पहला कवयित्री सम्मेलन भी हुआ था यहां

-प्रस्तुति-आदर्श नंदन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार
आगराः ‘हम तो मस्त फकीर, हमारा कोई नहीं ठिकाना रे,
जैसा अपना आना प्यारे, वैसा अपना जाना रे।‘ 
मस्त फकीर की जिंदगी जीने वाले पद्मश्री और पद्म भूषण से अलंकृत महाकवि गोपालदास नीरज ने अपने जीवन को एक फक्कड़ की तरह जीया,  मुंबई में रहे, लेकिन वहां भी मन नहीं लगा और आगरा उन्हें रास आ गया। आता भी क्यों नहीं, सूर, नजीर, गालिब, मीर तकी मीर, बाबू गुलाबराय, अमृतलाल नागर, अचला नागर जैसे महान साहित्यकारों की सुगंध जो थी इस धरती में।  उसने एक बार अपने आगोश में लिया तो फिर वे यहीं के होकर रहे गये।
यहां मन लगने का एक और कारण था। वर्ष 1960 के बाद की बात है, यमुना पार श्री गांधी आदर्श कन्या विद्यालय की स्थापना गांधी शांति सेना की संस्थापक अध्यक्ष डा.मनोरमा शर्मा कर रही थीं। इस विद्यालय के माध्यम से मनोरमा शर्मा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कराती थीं। उन्हीं दिनों नीरज से उनकी मुलाकात हुई और दोनों  का स्नेह बंधन बढ़ता गया। मुंबई में नीरज जी रहते थे और आगरा की उन्हें परवाह रहती थी। नीरजजी और डा.मनोरमा शर्मा ने मिल कर सन् 1963 में फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी नाइट स्टेडियम में कराई। मीना कुमारी ने उस समय नीरज जी की वजह से कोई मानदेय नहीं लिया। केवल ट्रेन से फर्स्ट क्लास की टिकट उनके लिए करा दी गय़ी थी और होटल क्लार्क शिराज में उन्हें ठहराया गया था। इस कार्यक्रम के बाद नीरज के  सहयोग और निर्देशन में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो गया था। 
उन दिनों सूरसदन या कोई बडा आडिटोरियम तो था नहीं। बेलनगंज के पंजा मदरसा में महालक्ष्मी टाकीज और धूलियागंज में बंसत टाकीज उस समय बहुत चर्चित थे। स्क्रीन के आगे स्टेज बना होता था और ग्रीन रूम भी होता था,जिससे नाटकों के मंचन व अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम वहां हुआ करते थे। नीरज जी और मनोरमा शर्मा ने इन टाकीजों में अनेक नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए। फिल्म अभिनेत्री और नृत्यांगना मधुमती और अभिनेता एवं फिल्म प्रोड्यूसर ओपी रल्हन के भी कार्यक्रम इन्हीं दोनों ने कराए थे। 
जीवनी मंडी के जाटनी के बाग में उस समय मैदान था। यहां भी अनेक कवि सम्मेलन व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए गए थे। आगरा के पहला कवियत्री सम्मेलन भी नीरज के सहयोग से जाटनी के बाग में हुआ था। इन आयोजनों में अंजना टाकीज के स्वामी रहे मोहन बाबू सहित शहर के अनेक गणमान्य जनों का सहयोग मिलता रहा था। इस प्रकार जिस सांस्कृतिक धारा को नीरज ने मनोरमा के गति दी, वह आज भी कायम है। 
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मुंबई में नीरज का स्वर्णिम युग
मुंबई में नीरज का एसा भाग्य चमका कि जो गीत उन्होंने लिख दिया, वो हिट गया। ‘आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन’…’ए भाई जरा देखके चलो, आगे ही नहीं पीछे भी’...’शोखियों में घोला जाए, फूलों का शबाब’...’लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में’ सहित अनेक गीत सुपर हिट होते गए। 
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मुंबई से वापस आना पड़ा
नीरज जी उन दिनों मनोरमा के बल्केश्वर के क्वार्टर 108/11-12 में प्रवास करते थे। उसके  बाद सरस्वती नगर,बल्केश्वर में आवास नीरज जी ने खुद ही बनवाया था। नीरज जी के ज्येष्ठ पुत्र अरस्तु प्रभाकर ने बताया कि मनोरमा जी के दो जुड़वां बच्चे हुए, जिनका नाम तब राम और श्याम रखा गया था।( अब शशांक और मृगांक)। राम जब ढाई-तीन साल का था, तब उसे तेज बुखार हो गया। उन दिनों ट्रंक काल पर बात हुआ करती थी। समय पर सूचना नहीं मिली तो यहां आकर आकर विचलित हुए और बच्चों की परवरिश के लिए वे मुंबई से आगरा गए और फिर गीतकार के रूप में वे वापस नहीं गए। महेश भट्ट आदि तमाम निर्देशकों के फोन आते रहे। इसके बाद वे मंच के गीतकार  होकर यशस्वी हो गये। 
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सरस्वती नगर आवास पर लगा रहता था जमावड़ा
देश की ख्याति प्राप्त हस्तियां सरस्वती नगर, बल्केश्वर स्थित आवास पर नीरज जी से मिलने आती रहती थीं। विख्यात तांत्रिक चंद्रास्वामी भी कई बार आए। मेधा पाटेकर, सतपाल मलिक,  मुलायम सिंह यादव, विष्णुकांत शास्त्री, केशरी नाथ त्रिपाठी सहित देश का कोई साहित्यकार, कवि, फिल्मी कलाकार एसे नहीं, जो उनके आवास पर नहीं आए हों।
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तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड
पद्म श्री व पद्म भूषण के अलावा सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत लेखन पर तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड पाने वाले नीरज का निधन 19 जुलाई 2018 को हो गया। नीरज जी की पुत्रवधू डा.वत्सला प्रभाकर ने बताया कि निधन की सूचना पर सबसे पहला फोन विख्यात संत मोरारी बापू का आया था, वे उस समय अमेरिका में थे।
नीरज जी भले ही हमारे बीच नहीं है,लेकिन  उनकी गीत, कविताएं उन्हें युगों तक जीवित रखेंगी। नीरज जी के शब्दों में उन्हें नमन करते हैं- ‘...सदियां लगेंगी मुझे भुलाने में’।
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बहादुर शाह जफर की भूमिका
नीरज के जीवन के 75 वर्ष पूरे होने पर  देश में कई जगह अमृत महोत्सव के आयोजन कराए गए थे। तब एक नाटक सूरसदन में मंचित किया गया था-लाल किला की आखिरी समां। उसमें  नीरज ने बहादुर शाह जफर की भूमिका की थी। इस कार्यक्रम में लोक गायिका तीजन बाई भी आई थीं। मशहूर नृत्यांगना शोभना नारायण ने नीरज के गीतों पर नृत्यों की प्रस्तुत दी थी।
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(वर्जन)
जब मीना कुमारी नाइट कराई गई थी, मैं भी उसमें शामिल था। मुझे याद है कि उस समय मीना कुमारी की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी, तब नीरज ने उन्हें सहारा देकर उठाया था। 
-अरुण डंग, साहित्यसेवी व उद्योगपति
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सन् 1973 में सरदार पटेल उद्यान में एक  विशाल कवि सम्मेलन कराया गया था। उसमें मेरा प्रथम काव्य संग्रह ‘क्षण भर ठहरो’ का विमोचन नीरज जी ने किया था। तब नीरज जी ने उस काव्य संग्रह को पढ़े बिना ही ‘क्षण भर ठहरो’ का विशद और गंभीर व्याख्या की थी।
-डा.राजेंद्र मिलन, वरिष्ठ कवि व साहित्यकार