19 जुलाई 2024 को नीरज की पुण्य तिथि पर प्रकाशित
‘…जैसा अपना आना प्यारे, वैसा अपना जाना रे।‘
आगरा के सांस्कृतिक धरातल को लगाए थे पंख
-अभिनेत्री मीना कुमारी नाइट सहित कई फिल्मी हस्तियों के कराए थे आयोजन
-देश का पहला कवयित्री सम्मेलन भी हुआ था यहां
-प्रस्तुति-आदर्श नंदन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार
आगराः ‘हम तो मस्त फकीर, हमारा कोई नहीं ठिकाना रे,
जैसा अपना आना प्यारे, वैसा अपना जाना रे।‘
मस्त फकीर की जिंदगी जीने वाले पद्मश्री और पद्म भूषण से अलंकृत महाकवि गोपालदास नीरज ने अपने जीवन को एक फक्कड़ की तरह जीया, मुंबई में रहे, लेकिन वहां भी मन नहीं लगा और आगरा उन्हें रास आ गया। आता भी क्यों नहीं, सूर, नजीर, गालिब, मीर तकी मीर, बाबू गुलाबराय, अमृतलाल नागर, अचला नागर जैसे महान साहित्यकारों की सुगंध जो थी इस धरती में। उसने एक बार अपने आगोश में लिया तो फिर वे यहीं के होकर रहे गये।
यहां मन लगने का एक और कारण था। वर्ष 1960 के बाद की बात है, यमुना पार श्री गांधी आदर्श कन्या विद्यालय की स्थापना गांधी शांति सेना की संस्थापक अध्यक्ष डा.मनोरमा शर्मा कर रही थीं। इस विद्यालय के माध्यम से मनोरमा शर्मा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कराती थीं। उन्हीं दिनों नीरज से उनकी मुलाकात हुई और दोनों का स्नेह बंधन बढ़ता गया। मुंबई में नीरज जी रहते थे और आगरा की उन्हें परवाह रहती थी। नीरजजी और डा.मनोरमा शर्मा ने मिल कर सन् 1963 में फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी नाइट स्टेडियम में कराई। मीना कुमारी ने उस समय नीरज जी की वजह से कोई मानदेय नहीं लिया। केवल ट्रेन से फर्स्ट क्लास की टिकट उनके लिए करा दी गय़ी थी और होटल क्लार्क शिराज में उन्हें ठहराया गया था। इस कार्यक्रम के बाद नीरज के सहयोग और निर्देशन में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो गया था।
उन दिनों सूरसदन या कोई बडा आडिटोरियम तो था नहीं। बेलनगंज के पंजा मदरसा में महालक्ष्मी टाकीज और धूलियागंज में बंसत टाकीज उस समय बहुत चर्चित थे। स्क्रीन के आगे स्टेज बना होता था और ग्रीन रूम भी होता था,जिससे नाटकों के मंचन व अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम वहां हुआ करते थे। नीरज जी और मनोरमा शर्मा ने इन टाकीजों में अनेक नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए। फिल्म अभिनेत्री और नृत्यांगना मधुमती और अभिनेता एवं फिल्म प्रोड्यूसर ओपी रल्हन के भी कार्यक्रम इन्हीं दोनों ने कराए थे।
जीवनी मंडी के जाटनी के बाग में उस समय मैदान था। यहां भी अनेक कवि सम्मेलन व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए गए थे। आगरा के पहला कवियत्री सम्मेलन भी नीरज के सहयोग से जाटनी के बाग में हुआ था। इन आयोजनों में अंजना टाकीज के स्वामी रहे मोहन बाबू सहित शहर के अनेक गणमान्य जनों का सहयोग मिलता रहा था। इस प्रकार जिस सांस्कृतिक धारा को नीरज ने मनोरमा के गति दी, वह आज भी कायम है।
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मुंबई में नीरज का स्वर्णिम युग
मुंबई में नीरज का एसा भाग्य चमका कि जो गीत उन्होंने लिख दिया, वो हिट गया। ‘आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन’…’ए भाई जरा देखके चलो, आगे ही नहीं पीछे भी’...’शोखियों में घोला जाए, फूलों का शबाब’...’लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में’ सहित अनेक गीत सुपर हिट होते गए।
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मुंबई से वापस आना पड़ा
नीरज जी उन दिनों मनोरमा के बल्केश्वर के क्वार्टर 108/11-12 में प्रवास करते थे। उसके बाद सरस्वती नगर,बल्केश्वर में आवास नीरज जी ने खुद ही बनवाया था। नीरज जी के ज्येष्ठ पुत्र अरस्तु प्रभाकर ने बताया कि मनोरमा जी के दो जुड़वां बच्चे हुए, जिनका नाम तब राम और श्याम रखा गया था।( अब शशांक और मृगांक)। राम जब ढाई-तीन साल का था, तब उसे तेज बुखार हो गया। उन दिनों ट्रंक काल पर बात हुआ करती थी। समय पर सूचना नहीं मिली तो यहां आकर आकर विचलित हुए और बच्चों की परवरिश के लिए वे मुंबई से आगरा गए और फिर गीतकार के रूप में वे वापस नहीं गए। महेश भट्ट आदि तमाम निर्देशकों के फोन आते रहे। इसके बाद वे मंच के गीतकार होकर यशस्वी हो गये।
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सरस्वती नगर आवास पर लगा रहता था जमावड़ा
देश की ख्याति प्राप्त हस्तियां सरस्वती नगर, बल्केश्वर स्थित आवास पर नीरज जी से मिलने आती रहती थीं। विख्यात तांत्रिक चंद्रास्वामी भी कई बार आए। मेधा पाटेकर, सतपाल मलिक, मुलायम सिंह यादव, विष्णुकांत शास्त्री, केशरी नाथ त्रिपाठी सहित देश का कोई साहित्यकार, कवि, फिल्मी कलाकार एसे नहीं, जो उनके आवास पर नहीं आए हों।
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तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड
पद्म श्री व पद्म भूषण के अलावा सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत लेखन पर तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड पाने वाले नीरज का निधन 19 जुलाई 2018 को हो गया। नीरज जी की पुत्रवधू डा.वत्सला प्रभाकर ने बताया कि निधन की सूचना पर सबसे पहला फोन विख्यात संत मोरारी बापू का आया था, वे उस समय अमेरिका में थे।
नीरज जी भले ही हमारे बीच नहीं है,लेकिन उनकी गीत, कविताएं उन्हें युगों तक जीवित रखेंगी। नीरज जी के शब्दों में उन्हें नमन करते हैं- ‘...सदियां लगेंगी मुझे भुलाने में’।
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बहादुर शाह जफर की भूमिका
नीरज के जीवन के 75 वर्ष पूरे होने पर देश में कई जगह अमृत महोत्सव के आयोजन कराए गए थे। तब एक नाटक सूरसदन में मंचित किया गया था-लाल किला की आखिरी समां। उसमें नीरज ने बहादुर शाह जफर की भूमिका की थी। इस कार्यक्रम में लोक गायिका तीजन बाई भी आई थीं। मशहूर नृत्यांगना शोभना नारायण ने नीरज के गीतों पर नृत्यों की प्रस्तुत दी थी।
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(वर्जन)
जब मीना कुमारी नाइट कराई गई थी, मैं भी उसमें शामिल था। मुझे याद है कि उस समय मीना कुमारी की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी, तब नीरज ने उन्हें सहारा देकर उठाया था।
-अरुण डंग, साहित्यसेवी व उद्योगपति
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सन् 1973 में सरदार पटेल उद्यान में एक विशाल कवि सम्मेलन कराया गया था। उसमें मेरा प्रथम काव्य संग्रह ‘क्षण भर ठहरो’ का विमोचन नीरज जी ने किया था। तब नीरज जी ने उस काव्य संग्रह को पढ़े बिना ही ‘क्षण भर ठहरो’ का विशद और गंभीर व्याख्या की थी।
-डा.राजेंद्र मिलन, वरिष्ठ कवि व साहित्यकार