Thursday, June 15, 2023

सुखद स्मृति आकाशवाणी की

सुखद अनुभव रहे आकाशवाणी के

आकाशवाणी से मेरे बहुत पुराने संबंध रहे हैं। मेरे पूज्य पिताजी स्वाधीनता सेनानी स्व.रोशनलाल गुप्त करुणेश की आकाशवाणी मथुरा पर भेंट वार्ताएं हुआ करती थीं। क्योंकि पिताजी के मन मस्तिष्क में पूरा स्वाधीनता आंदोलन और विश्व की क्रांतियां समाहित थीं। इसलिए उन्हीं को आकाशवाणी मथुरा के अधिकारी बुलाया करते थे। वहां पर मैं पिताजी के साथ जाया करता था। वहां पर कई बार श्रद्धेय अचला नागर जी से भी मेरी भेंट हुई, लेकिन व्यस्तता उनकी बहुत हुआ करती थी। 
उन दिनों ज्यादातर रिकार्डिंग, इंटरव्यू श्री सत्यदेव आजाद जी और श्री श्रीकृष्ण शरद जी लिया करते थे। ये दोनों ही समय-समय पर आगरा आकर भी अलग-अलग लोगों के साक्षात्कार लेकर रूपक आदि तैयार करते थे। और भी अधिकारी थे, लेकिन नाम अब याद नहीं रहे।
पिताजी और मैं बस से जाते। नाम मात्र को पारश्रमिक मिलता था, जो बस यात्रा, द्वारिकाधीश जी के दर्शन, भोग और वहां से पेड़े खरीदने आदि में ही व्यय हो जाता था। लेकिन उस समय तो केवल आकाशवाणी ही जन-जन का प्रिय था। प्रचार, समाचार और मनोरंजन का एक मात्र यह माध्यम था। कभी-कभी आकाशवाणी से लौटते समय गायत्री तपोभूमि भी हम लोग जाते थे, जहां क्रांतिकारी श्री सत्यभक्त जी से मुलाकात होती थी। वे गायत्री तपोभूमि के लिए देशभक्तों पर ट्रेक्ट (छोटी-छोटी पुस्तकें) लिखा करते थे। 
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मेरी भी वार्ताएं
पिताजी के साथ जाते-जाते मुझे भी आकाशवाणी पर युव वाणी में वार्ता करने का मौका मिल गया। जहां तक मुझे याद है, मेरी पहली वार्ता 16 मार्च 1986 को थी, जिसका विषय था स्वाधीनता संग्राम में आगरा के बलिदानी वीर। इसमें सफलता मिलने लगी तो अन्य विषयों पर भी अवसर मिला। 22 सितंबर 1986 को धरती का क्षेत्रफल और आबादी का भार पर वार्ता रही। उन दिनों हम लोगों ने आगरा में नेत्रदान अभियान चलाया था। जो टाइम्स आई रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली के सहयोग से संचालित था। 14 जून 1987 को नेत्रदान महादान पर आकाशवाणी मथुरा से वार्ता प्रसारित हुई। भारतीय साहित्यकारों के आदर्श टैगोर, (9-6-1988), आयुर्वेद का विकास, समाचार साप्ताहिकी (18-1-1997) सहित अनेक अन्य वार्ताएं प्रसारित हुई। समाचार साप्ताहिकी भी कई बार प्रसारित हुई। आगरा में आकाशवाणी केंद्र शुरू होने के बाद अभी तक वहां से निरंतर मेरी वार्ताएं प्रसारित हो रही हैं। 
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आगरा में आकाशवाणी
आगरा में लंबे समय से आकाशवाणी केंद्र खोले जाने की मांग चल रही थी। उसे पूरा करते हुए विभव नगर में केंद्र का सन् 1989 में शुभारंभ हुआ। उद्घाटन के समय पत्रकारों के लिए सम्मानजनक व्यवस्था न होने पर पत्रकारों ने उसका बहिष्कार कर दिया था। तब मुख्य अतिथि एवं तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री हरीकिशन भगत एवं प्रदेश मंत्री डा.कृष्णवीर सिंह कौशल भी पत्रकारों के साथ धरने पर बैठ गए और उन्हें मना लिया था। 

आकाशवाणी आगरा पर भी पूज्य पिताजी के इंटरव्यू लगातार होते रहे। एक लंबी भेंट वार्ता सुश्री ऋतु राजपूत जी ने की थी। श्रीकृष्ण शरद जी भी मथुरा आकाशवाणी से आगरा ही आ गए थे। वे व अन्य अधिकारी पिताजी का साक्षात्कार समय-समय पर लेते रहे। मैं अभी भी विभिन्न विषयों पर वार्ता तक दे रहा हैं। वहां तब श्री दुर्ग विजय सिंह दीप भी थे। मैंने उनके साथ दैनिक स्वराज्य टाइम्स में कार्य किया था। वे भी हमारा सहयोग करते थे। उनके अलावा बहुत सारे अधिकारी आए और चले गए। जब दैनिक जागरण ज्वाइन किया तो कई बार वहां की वीट भी देखी और आकाशवाणी द्वारा आयोजित कई संगीत सम्मेलनों का कवरेज किया। 
इन दिनों भी श्री पृथ्वीराज चौहान जी, महेंद्र सिंह जैमिनी, कुंदन सिंह जी, नीरज जैन जी, सर्वेश जी, श्रीकृष्ण जी, अजय प्रकाश जी, मुकेश वर्मा जी, विनोद शर्मा जी, देव प्रकाश शर्मा जी, राजेश शर्मा जी, मोहित कुमार जी सहित कई नाम एसे हैं, जिनका हमेशा सहयोग ही नहीं मिला, बल्कि आत्मीयता रही। अशोक धवन जी का भले ही कार्यक्रम या प्रसारण में कोई योगदान नहीं रहता, लेकिन उनसे लगातार संपर्क रहा। कई साल तक वे आगरा दूरदर्शन पर तैनात रहे, फिर से आकाशवाणी पर स्थानांतरित हो गए हैं। 
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तब बहुत बड़ी बात थी रेडियो पर बोलना
जब तक दूरदर्शन शुरू नहीं हुआ, तब तक आकाशवाणी का विशेष महत्व रहा। उस पर अपनी वार्ता प्रसारित करना बड़ा गौरवशाली माना जाता था। पूरे मौहल्ले में चर्चा हो जाती थी, सभी रेडियो और ट्रांजिस्टर पर सुना कर थे। अखबारों में भी छपता था-“आदर्श नंदन आज आकाशवाणी” पर। 
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बांसुरी वादक करते हैं रिकार्डिंग
आकाशवाणी आगरा पर व्यवस्था कभी भी बहुत अच्छी नहीं रहीं। मैंने जब दैनिक जागरण से आकाशवाणी की वीट देखी, तभी मुझे पता चला कि बहुत दिनों से आकाशवाणी पर रिकार्डिस्ट की नियुक्ति नहीं हुई है। वहां जो रिकार्डिंग करते थे वे थे बांसुरी वादक संगीतज्ञ रामकृष्ण जी। मैंने यह समाचार प्रमुखता से लिख दिया। उसके बाद मुझे लगा कि रामकृष्ण जी कहीं बुरा नहीं मान गए हों, लेकिन वे बहुत ही सरल, सहज व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने इसे अपनी आलोचना नहीं समझा। मुझे पता चला है कि उनका निधन हो चुका है, अब उनके सुपुत्र प्रियंक कुमार सैक्सोफोन के अंतरराष्ट्रीय स्तर के वादक है। 
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5.50 लाख रुपया सरकार लेकर पैर बनवाया 
तभी मैंने एक खबर और लिखी थी। आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी मुकेश वर्मा जी के पैर में कोई दिक्कत हो गई थी। तब उन्होंने बड़ी जद्दोजहद करके सरकार से 5.50 लाख रुपये की मदद ली और अपना कृत्रिम पैर बनवाया था। 
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आकाशवाणी का संघर्ष 
अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। अभी भी साहित्यकारों, कवियों और संस्कृति कर्मियों को वहां प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए बुलाया जाता है। जरूरत है उसके परिमार्जन की। नई तकनीकी के साथ, नई युग में कदम से कदम मिला कर चलने की। लेकिन आकाशवाणी का संघर्ष बढ़ता जा रहा है। अधिकारी व कर्मचारी तेजी से सेवानिवृत हो रहे हैं, उनकी जगह नई नियुक्ति भी नहीं हो रही है।

Tuesday, March 28, 2023

कल उमड़ी थी, मिट आज चली

... कल उमड़ी थी मिट आज चली...
सन् 1982 के करीब की बात है। तब मैं साप्ताहिक स्वराज्य व दैनिक स्वराज्य टाइम्स के संपादक मंडल में था। साहित्य ही मेरा प्रिय विषय था।अतः इस प्रकार आलेख लिखना व संपादन किया करता था।देश भर की पत्र-पत्रिकाओें का पढ़ने में रुचि भी थी। परम पूज्य महादेवी वर्मा जी के प्रति अटूट  श्रद्धा थी। पाठ्यक्रमों में मैंने उनको पढ़ा था। तब बहुत बड़े साहित्यकार भी संपादक के नाम पत्र लिखने में संकोच नहीं करते थे।एक दिन साप्ताहिक हिंदुस्तान में पूज्य महादेवी वर्मा जी का युवाओं पर एक पत्र प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने यह लिखा था कि बेरोजगारी के कारण ही युवा अपराध की दुनिया में जा रहा है।
मुझे पढ़ कर अच्छा नहीं लगा। मैंने पूरी श्रद्धा के साथ, पूज्य महादेवी जी से क्षमा याचना सहित एक पत्र साप्ताहिक हिंदुस्तान के पत्र कालम के लिए ही लिखा।उसमें मैंने उनकी बात का विरोध किया। लिखाकि यदि कोई युवक बेरोजगार है तो क्या वह अपराध की दुनिया में चला जाएगा। रोजगार के लिए अन्य उपाय है। अपराध की दुनिया में रोजगार युवक भी जा सकते हैं। मैंने लिखा कि युवाओं नकारात्मक सोच की नहीं, सकारात्मक सोच की जरूरत है।
वह पत्र साप्ताहिक हिंदुस्तान ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। (मुझ पर इसका कोई प्रमाण नहीं है)
11 सितंबर 1987 को स्वराज्य टाइम्स कार्यालय में बैठा था। ट्रांजिस्टर पर समाचार सुन रहा था। अचानक समाचार आया,महादेवी जी का निधन हो गया। मैं स्तब्ध रह गया। हिंदी साहित्य का बहुत बड़ा नुकसान था। मेरी आंखें छलछला गई। मेरे दिमाग में उन्हीं की कविता की दो पंक्तियां बार-बार तैर रही थीं-..कल उमड़ी थी, मिट आज चली। तभी मैंने उनका समाचार स्वराज्य टाइम्स के लिए लिखना शुरू किया। उनके परिचय के साथ साहित्यिक यात्राऔर देहावसान पर शोक। आगरा के कुछ साहित्यकारों की ओर से श्रद्धांजलि भी लिखी । मैंने हैडिंग लगाया था---कल उमड़ी थी मिट आज चली। यह समाचार प्रकाशित हुआ। दूसरे दिन प्रेस जाकर जब मैंने दिल्ली के समाचार पत्र देखे तो उनमें भी यही शीर्षक था। मुझे बहुत अच्छा लगा। यानि मुझे लगा कि मेरी सोच भी वही थी जो दिल्लीा के पत्रकारों की रही होगी।
आज महादेवी जी की जयंती है। मुझे यह स्मृतियां आज ताजा हो गईं। उनकी जयंती पर मैं उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन करता हूं।

Monday, January 9, 2023

केशरीनाथ त्रिपाठी ने किया था नमन वीडियो का विमोचन


सरल एवं सादगी के प्रतिरूप थे केशरीनाथ त्रिपाठी जी

केशरीनाथ जी ने करुणेश जी पर बनी नमन एलबम का  किया था विमोचन

6 दिसंबर 2004 को ताज प्रेस क्लब द्वारा माथुर वैश्य महासभा भवन में  पद्मश्री व पद्म भूषण कवि नीरज जी के 80 वे जन्मदिवस को गौरव महोत्सव के रूप में मनाया गया था। इसमें प्रदेश विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष श्री केशरी नाथ त्रिपाठी व श्रीमती सुषमा स्वराज मुख्य रूप से उपस्थित थीं। मंच पर डा.भीमराव आंबेडकर विवि के पूर्व कुलपति डा.अगम प्रसाद माथुरसमाजसेवी स्व. धर्मपाल विद्यार्थी व ताज प्रेस क्लब के तत्कालीन अध्यक्ष गजेंद्र यादव भी मंचासीन थे।

साहित्यसेवी आदर्श नंदन गुप्ता ने बताया कि कवि नीरज के इस गौरव महोत्सव में श्रीमती सुषमा स्वराज्य व श्री केशरी नाथ त्रिपाठी ने स्वाधीनता सेनानी स्व.रोशनलाल गुप्त करुणेश के जीवन पर मून टीवी द्वारा बनाई वीडियो एलबम नमन का विमोचन भी किया था। मून टीवी के डायरेक्टर श्री राहुल पालीवाल व संपादक श्री राजीव दीक्षित के निर्देशन में बनी इस एलबम की निर्माम व एंकंरिंग गुंजन शर्मा बेहतरीन तरीके से की है और उसे शूट किया था हरीओम ने। उस समय केशरीनाथ त्रिपाठी ने करुणेश के स्वाधीनता आंदोलन क्रांतिकारी भूमिका को काफी सराहा था।

इसके अलावा केशरी नाथ जी समय-समय पर आगरा आए और मेरी उनसे मुलाकात, बातचीत भी हुई। चूंकि नीरज जी से वे बहुत प्रभावित थे, अतः उनके हर कार्यक्रम में वे आते थे। समाजसेवी कांतिभाई पटेल से भी केशरीनाथ जी प्रभावित रहे। कांतिभाई पटेल की पुस्तक कृष्ण गौरवगाथा का विमोचन 5 मई 2003 को  केशरीनाथ ने किया था। कांतिभाई पटेल के अमृत महोत्सव में भी वे मुख्य अतिथि थे। तभी भी मेरी उनसे बातचीत और मुलाकात रही। उनके निधन से हमने सच्चे और ईमानदार नेता को खो दिया है। उनके निधन पर में शोक व्यक्त करते हुए हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।


Thursday, July 14, 2022

सावन में नियमित करें शिव मंदिरों के दर्शन *पूरे देश में छाया गीत "आगरा हमारा अभिमान"* ताजनगरी आगरा के पर्यटन को प्रोत्साहित करने और सांस्कृतिक गौरव को देश-दुनिया तक पहुँचाने के उद्देश्य से *आगरा विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र पेंसिया की अनूठी पहल* को हर ओर सराहना मिल रही है। डॉ. राजेंद्र पेंसिया के सौजन्य और *वरिष्ठ पत्रकार व साहित्य सेवी आदर्श नंदन गुप्ता* के सहयोग से तैयार आगरा का गीत "आगरा हमारा अभिमान" पूरे हिंदुस्तान में छाया हुआ है। यूट्यूब, फेसबुक और व्हाट्सएप सहित सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों से इस गीत को सैकड़ों लोगों द्वारा सुना, देखा और सराहा जा रहा है। आगरा के *लाड़ले कवि कुमार ललित* द्वारा रचित आगरा के इस गीत पर निर्मित वीडियो का निर्देशन फिल्म निर्देशक नारायण चौहान (मुंबई) ने किया है। उन्होंने इस वीडियो में गीत के बोलों के अनुसार आगरा के मंदिरों, रास्तों, ऐतिहासिक इमारतों, घाटों, धर्म स्थलों, उत्सवों, मेलों, बाजारों और लोगों को बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया है। इस गीत को नानू गुर्जर, लता सिंह और मयूरा दत्ता ने स्वर दिया है। संगीत मयूरा दत्ता का है। कृपया इस वीडियो को अधिक से अधिक *शेयर कीजिए, कमेंट व लाइक* कीजिए।

https://youtu.be/iYHzjuNzheQ

Saturday, February 12, 2022

मेरी यादों मेंकाका हाथरसी

जिंदगी को वक्त के सांचे में ढाल कर
मुस्कुराओ मौत की आंखों में आंख डाल कर।
जिदंगी के इस मूलमंत्र को मानने वाले काका हाथरसी खुद अपने जीवन में हंसे ही नहीं बल्कि अपनी रचनाओं से इस देश और दुनिया को जमकर ठहाके लगवाए। वे हिंदी के पहले एेसे कवि थे जिन्होंने हास्य रस की कविताओं को मंच पर लोकप्रियता प्रदान की। हास्य कविताओं को मान सम्मान दिलवाया।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर हाथरस के निवासी काका हाथरसी का मूल नाम प्रभु दयाल गर्ग था। काका ने करीब 70 वर्ष तक काव्य साधना की।45 वर्ष तक विभिन्न काव्य मंचों पर लोकप्रियता के शिखर पर रहे। कला रत्न की उपाधि से अलंकृत काका हाथरसी को सन् 1985 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने हास्य व्यंग्य की रचनात्मक साहित्य की 42 पुस्तकें लिखीं।
काव्य के अलावा संगीत जगत भी काका को हमेशा याद रखेगा। उन्होंने 1932 में हाथरस में ही संगीत कार्यालय की स्थापना की। इसके तहत संगीत पर करीब 150 महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुए। उन्होंने 1934 में संगीत नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, जो हिंदी के सबसे पुरानी मासिक पत्रिका के रूप में लोकप्रिय है। जो उनके निधन के बाद अभी भी प्रकाशित हो रही है।जिसे उनके पुत्र लक्ष्मीनारायन गर्ग संभाले हुए हैं।
काका ने बाद में फिल्म संगीत और म्यूजिक मिरर नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी शुरू किया था। उन्होंने बसंत छद्म नाम से संगीत विशारद पुस्तक भी लिखी, जो अाज भी विश्व विद्यालयों में सबसे ज्यादा पढ़ायी जाने वाली पुस्तक मानी जाती है। बहुत कम लोगों को मालुम है कि काका एक बहुत अच्छे चित्रकार भी थे। उन्होंने करीब 150 तेल चित्र बनाए, जिनमें अनेक चित्र शास्त्रीय संगीत के पुराने उस्तादों के हैं।
काका ने सन् 1975 में काका हाथरसी पुरस्कार की शुरुआत की, जो आज भी प्रतिवर्ष दिया जाता है। जिसे विख्यात कवि अशोक चक्रधर संभाले हुए हैं। काका हिंदी के पहले कवि थे, जिनकी निजी काव्य गोष्ठियां कई कई बार थाईलैंड, इंग्लैंड, सिंगापुर, अमेरिका, कनाडा आदि देशो में हुईं। अमेरिका के मेयर वाल्टीमोर ने सन् 1984 में उन्होंने आनरेरी सिटीजन शिप देकर सम्मानित किया था।

कविता का प्रमुख पात्र थ काकी
काका में हास्य कविता के बीज तो विवाह से पूर्व ही प्रस्फुटित हो गए थे। अपनी कविताओं में वे भावी पत्नी को लक्ष्य बनाकर कविता करते  थे। विवाह के बाद में उनकी पत्नी काकी (रतनदेवी) उनकी प्रिय पात्र बन गई थीं।  उनकी एक कविता काफी लोकप्रिय हुए,
काकी जब से घर आई है, ,
पिचके काका के गाल सखे..
मैके जाने का नोटिस देकर मुझको नित्य डराती है।
लेकिन मोटर के अड्डे से वापस घर को आती है। 
भय के मारे मन ही मन,
देता रहता हूं ताल सखे,
मत पूछो मेरा हाल सखे।

दाढ़ी को अपना प्रमुख आकर्षण मानते हुए काका सुनाते थे
पहली दौलत मानिए हास्य व्यंग्य का ज्ञान,
दूजी दाढ़ी मानिए,  तीजी काकी मान।

इसी प्रकार की एक और कविता लोकप्रिय रही
काका दाढ़ी राखिए, बिन दाढ़ी सब सून,
ज्यों मंसूरी के बिना व्यर्थ है देहरादून,
व्यर्थ है देहरादून, इसी से नर की शोभा,
दाढ़ी से ही प्रगति कर गए संत विनोबा।
मुनि वशिष्ठ यदि दाढ़़ी मुंह पर नहीं रखाते,
तो क्या वे भगवान राम के गुरु बन जाते।

जन्म,मरण एक ही दिन
एेसा मौका शायद ही किसी संत और महंत को मिला होगा, जिनके जन्म और मरण की तारीख एक ही हो। काका हाथरसी का जन्म 18 सितंबंर 1906 और निधन 18 सितंबर 1995 को हुआ था।
उंट गाड़ी पर निकाली थी उनकी शवयात्रा
काका की वसीयत के अनुसार उनकी शवयात्रा उंट गाड़ी में निकाली गई थी। और लोग हंसते, गाते कविता सुनाते, ठहाके लगाते शामिल हुए थे। श्मशान घाट पर श्रद्धाजंलि सभा के बजाए हास्य काव्य गोष्ठी हुई थी।

फ़िल्म निर्माता, निर्देशक रवि टण्डन के रग रग में बसता था आगरा

रवि टंडन के रग-रग में बसता था आगरा

फिल्म निर्माता, निर्देशक श्री रवि टंडन के निधन से फिल्म जगत को नहीं, आगरा  को भी बहुत क्षति हुई है।  भले ही उनसे आगरा छूट गया था, लेकिन उनका दिल इसी ताज नगरी में ही रहता था। मैंने जब-जब भी उनसे बात की, वे बहुत खुश होते थे और आगरा के संबंध में बहुत सी जानकारियां करते थे। 
मैंने पहली बार उनसे संभवतः दिसंबर 2011 में फोन पर बात की। जब दैनिक जागरण में मैंने सितारों के सरताज कालम में आगरा के गौरवशाली विभूतियों के बारे में लिखा। वरिष्ठ रंगकर्मी स्व.जितेद्र रघुवंशी जी से टंडन जी का नंबर लेकर विस्तृत इंटरव्यू लिया। उसके बाद जब भी कोई वर्जन दैनिक जागरण के लिए लेना होता तो मैं उनसे बात करता। 21 सितंबर 2020 में जब नोएडा में फिल्म सिटी की घोषणा मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी ने की तो मैंने उसके संबंध में उनसे फोन पर बात की। वे काफी खुश हुए। उनका कहना था कि  ऐसा लगता है कि मैं फिर से जवान हो जाऊं और उप्र में फिल्में बनाऊं। देश में कहीं भी उप्र के कलाकार होंगे, वे प्रदेश में फिल्म सिटी बनने की घोषणा से प्रसन्न होंगे। मुंबई में काम कर रहे उप्र के लोग अब वापस आने का मन बनाएंगे।
उन्होंने कहा था कि यदि उप्र में पहले ही फिल्म सिटी बन जाती तो उन्हें मुंबई आकर लंबे समय तक संघर्ष नहीं करना पड़ता। अब उप्र के लोगों को फिल्मों में काम करने का मौका मिलेगा, जिसमें प्रतिभा होगी वे बहुत आगे तक बढ़ेंगे।
टंडन जी ने मुख्यमंत्री योगी श्री आदित्यनाथ को बधाई देते हुए कहा था कि जितना उन्होंने प्रदेश के सांस्कृतिक विकास के लिए किया है, उतना किसी और ने नहीं किया। आगरा की साहित्य, संस्कृति की सराहना करते हुए टंडन ने कहा था कि यदि पहले ही फिल्म सिटी यूपी में होती तो नीरज, हरिवंश राय बच्चन जैसी बहुत सी विभूतियों को उत्तर प्रदेश छोड़कर मुंबई नहीं जाना पड़ता। 
लीडर्स आगरा के कार्यक्रम में उन्हें अवार्ड दिया  गया था। तब उनसे मैंने और हमारे मित्र डा.महेश धाकड़ ने वरिष्ठ रंगकर्मी रज्जू टंडन जी के कमला नगर स्थित आवास पर रवि टंडन जी का विस्तृत इंटरव्यू लिया था।