Tuesday, December 1, 2020

सबके हमदर्द थे दिनेश बंसल कातिब

मौत उसी की होती है, जिस पर जमाना करे अफासोस

यूं तो दुनिया में सभी आए हैं मरने के लिए।

बहुत कम ही शख्सियत एसी होती हैं, जिनके निधन पर लोग स्तब्ध रह जाएं। वही व्यक्ति लोगों का दिल जीत सकता है, जो हर किसी के काम आए, वह भी निस्वार्थ भाव से। हमारे आदरणीय श्री दिनेश बंसल कातिब जी भी एसे समाजसेवी थे, जिन्होंने शहर को दिया ही दिया। कभी कुछ पाने की तमन्ना नहीं रही।

उन्होंने समाज को जो दिया, उतना शायद ही कोई दे पाए। मेरी सबसे पहली मुलाकात अग्रवाल महासभा के कार्यक्रमों में हुई थी। उसके बाद एसा सिलसिला चला कि शहर के बड़े और प्रमुख कार्यक्रमों में उनसे मुलाकात होने लगी थी। वे मुझे बहुत स्नेह करते थे। उन्होंने एसे कई कार्यक्रम भी किए जो आसान नहीं थे। बल्केश्वर में यमुना के तट पर मेरी याद में केवल उन्होंने ही श्रीमद् भागवत सप्ताह कराई थी। किसी भी शंकराचार्य की कथा कराना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने करके दिखाई। इस कार्यक्रम को लेकर मैंने पहले उनसे शंका जताई थी। मैंने कहा था कि आजकल लोग नाचने, ठुमकने वाली भागवत कथाओं में जाते हैं, इसमें कौन आएगा। वे बोले, आदर्श बाबू , देखना तो सही...। वास्तव में उनका कहना सही था, काफी भीड़ रही। इसी प्रकार उन्होंने कमला नगर में श्रीकृष्णलीला का मंचन कराया, वह भी बहुत सफल रहा। हाल ही में कोठी मीनाबाजार में मंगलम परिवार की राम कथा विख्यात संत विजय कौशल महाराज की कराई, उसमें भी उनका अनुभव रहा। वे बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन कराने में सिद्धहस्त हो गए थे। उनकी तन्मयता और निस्वार्थ भाव होने के कारण किसी काम में न कोई दिक्कत आती न कोई विघ्न पड़ता था। मैंने यह भी देखा कि किसी कार्यक्रम में उन्होंने अपने आप को न कभी हावी किया, न किसी को हावी होने देना चाहते थे।

वाटर वर्क्स स्थित गोशाला कमेटी के वे महामंत्री थे। उन्होंने उसका संरक्षण ही नहीं किया, बल्कि उसके स्वरूप को ही बदल दिया। वहां व्यक्तिगत खर्चे से भी एक हाल बनवाया, जिसका कभी कोई प्रचार नहीं किया। गोशाला कमेटी की स्मारिका भी उन्हीं की वजह से हम लोग प्रकाशित करा सके थे।  

श्रीराम लीला कमेटी में वे वरिष्ठ उपाध्यक्ष थे। उसमें वे आधुनिकता लाने चाहते थे। मेरे द्वारा लिखी गई पुस्तक को उन्होंने बहुत पंसद किया और जल्द ही प्रकाशित कराना चाहते थे। उन्होंने सारी रूपरेखा भी बता दी थी, उनका निर्देशन होता तो अब तक प्रकाशित भी हो गई होती। पिछले महीने ही इंद्रपुरी देवी मंदिर में वे मिले, मंदिर पर पुस्तक के बारे में उन्होंने महंत जी के सामने ही कहा था कि तुम मेरे पास आओ, मैं सब करा दुंगा। यानि हर काम में वे दिलचस्पी लेते और मदद की भावना रहती थी।

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि 35 साल की पत्रकारिता में मैंने एसा समाजसेवी नहीं देखा, जो हर समय समाज के लिए समर्पित रहा हो। अग्रवाल समाज के उत्थान के लिए हर प्रकार की कल्पना वे करते थे। अब जररूत है उनके शेष कार्यों को पूरा करने की। उनके बताए रास्ते पर चलने की।

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अब उन पर प्रकाशित हो स्मारिका

मेरा मानना है कि कागज पर लिखा या छपा हुआ ही हमेशा याद रहता है। उसी से इतिहास बनता है, वही धरोहर होती है। बंसल जी ने जितना किया, जो किया, जो कराया, उस सब पर एक स्मारिका का प्रकाशन होना चाहिए। जो हम सबको ही नहीं, पूरे समाज को सेवा करने की प्रेरणा देगी।

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हर किसी के लिए हर किसी के भाव नहीं उमड़ते। मैं उनके निधन से बहुत आहत हूं। उनके निधन से जो क्षति हुई है, उसकी पूर्ति होना असंभव है। मेरे ख्याल से विधायक जगन प्रसाद गर्ग जी के बाद शहर की यह सबसे बड़ी क्षति हुई है। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि उन्हें अपने चरणों में स्थान दे कर उनकी आत्मा को परम शांति प्रदान करें। उनके परिजनों को इस संकट को सहन करने की शक्ति दें। ऊं शांति।

--आदर्श नंदन गुप्त, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार

Thursday, November 26, 2020

बच्चों में बच्चे बन गए थे प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो यशपाल

बच्चों में बच्चे बन गए थे प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो यशपाल

आज विख्यात वैज्ञानिक पदम् विभूषण प्रो यशपाल का जन्मदिन है  उन्होंने इस देश को।जो दिया है, उसे भुलाया नहीं जा सकता।
प्रोफेसर साहब से मेरी मुलाकात करीब 15 वर्ष पूर्व बल्केश्वर के सेंट एंड्रूज स्कूल में हुई। मैंने वहां उनका इंटरव्यू लिया था। उन्होंने उस समय भारत मे हो रही वैज्ञानिक तरक्की के बारे में विस्तार से बताया। वहीं उनका कहना था कि।नई पीढ़ी के प्रति वे बहुत आशान्वित हैं। कार्यक्रम के दौरान भी उन्होंने छोटे विद्यार्थियों के साथ अपनापन दिखाया। उनसे प्रश्न किये व उनके प्रश्नों के जवाब भी दिए। उन्होंने गणित की कठिनाइयों के सरल तरीके भी बताए। इतना महान व्यक्तित्व इतना सरल और सहज होगा। कोई सोच नहीं सकता था। मैं उन्हें श्रद्धा पूर्वक नमन करता हूँ।
यह चित्र प्रो यशपाल जी से बात करते हुए है।साथ मे भाई सेंट एन्ड्रूज स्कूल के स्वामी डॉ गिरधर शर्मा और पत्रकार भाई राम कुमार शर्मा हैं।
किरणों के अध्ययन में अपने योगदान के लिए यशपाल जी ने 1949 में पंजाब विश्वविद्यालय से भौतिकी में मास्टर्स की हासिल की थी। 
उन्होंने 1958 में मासाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पीएचडी की डिग्री हासिल की थी। विज्ञान और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में अपने योगदान के लिए 1976 में वह पद्म भूषण से नवाजे गए थे।लोक प्रशासन, शिक्षा और प्रबंधन में उत्कृष्ट काम के लिए अक्टूबर 2011 में उन्हें लाल बहादुर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

नहीं बना सका मनोरमा जी के सपनों का गांधी स्मारक

नहीं बना सका मनोरमा जी के सपनों का गांधी स्मारक

सर्वोदय विचारक, गांधीवादी आदरणीय श्रीमती मनोरमा शर्मा बहन जी ने शहर को अनेक आयाम प्रदान किए। कुछ सपनों को भी संजोया, जिसके लिए जीवन भर उन्होंने इसके प्रयास किए। जो सपने उन्होंने संजोए, जीते जी तो पूरे हो सकते थे, लेकिन उनकी आंख समय से पहले ही मिचने के कारण वे सपने अधूरे रह गए। उनमें एक सपना था यमुना पार स्थित गांधी स्मारक को पर्यटन केंद्र बनाने का। उसका उन्होंने कायाकल्प करा दिया था। वे चाहती थीं कि जो भी पर्यटक एत्माद्दोला का अवलोकन करने आएं, वे गांधी स्मारक भी देंखे। इसी प्रकार सपेरों का गांव के पास सकलपुर का उन्होंने विकास किया। उसके और अधिक विकास का सपना था। इन कार्यों से मुझे अवगत कराती रहती थीं, मुझे अक्सर इन स्थलों पर ले जाती थीं।

ये दोनों सपने उनके अभी तक अधूरे हैं। शासन, प्रशासन हमेशा दबाव की राजनीति करता है। जहां तक का विकास मनोरमा बहन जी ने कराया, उसके आगे कुछ नहीं बढ़ा, बल्कि उपेक्षा के कारण फिर से गांधी स्मारक दुर्गति की ओर है।

बहन जी ने अपने स्तर पर बड़े बड़े कार्यक्रम आगरा में कराए। एक लाख से अधिक लोगों की यमुना यात्रा का स्वागत उन्होंने आगरा में कराया, उनकी व्यवस्था कराई थी। उनका बल्केश्वर स्थित आवास पर देश के प्रमुख लोगों का आवागमन रहता था। मैंने यहाँ तांत्रिक श्री चंद्रास्वामी से दो बार मुलाकात की। यहीं पर गांधीवादी एसएन सुब्बाराब, मेधा पाटेकर, स्वामी अग्निवेश, जल पुरुष राजेंद्र आदि तमाम लोगों से साक्षात्कार लिए थे।

बहन जी का स्नेह हम लोगों पर सदैव रहा। हर हफ्ते किसी न किसी बहाने से मुलाकात और दो-चार बार फोन करना, यह उनकी आदत में शुमार था, यानि उनकी यह हम पर बड़ी कृपा थी। हमें कभी कोई दुख न हो, इसका पूरा ध्यान रखती थीं। उनका ममत्व अब हमेशा याद आता है। उनसे बिछ़ुड़े भले ही 12 साल हो गए, आज भी उनकी छवि आंखों में समाई रहती है।
उनके द्वारा स्थापित महिला शांति सेना का नेतृत्व उनकी पुत्रवधु श्रीमती वत्सला प्रभाकर कर रही है।

आज बहनजी की परम पुण्य तिथि पर कोटि-कोटि नमन करता हूं।

-आदर्श नंदन गुप्त, वरिष्ठ पत्रकार

Friday, October 16, 2020

टेंट में तख्त पर लिया था अनुराधा पोंडवाल का इंटरवयू

*संस्मरण 5*

*टैंट में तख्त पर बैठकर लिया अनुराधा पौंडवाल का इंटरव्यू* 

दो मई 1997, कोठी मीना बाजार मैदान। यहां देवी जागरण का आयोजन किया गया था, जिसमें विख्यात गायिका अनुराधा पौंडवाल और उनकी बेटी कविता पौंडवाल भजन प्रस्तुत करने आईं थीं।

कार्यक्रम न होने की अफवाह फैला दी गई। निर्धारित राशि उन्हें नहीं दी गई। कार्यक्रम संकट में आ गया था। इस दौरान संकटमोचन के रूप में उभर कर आए डाक्टर सोप कंपनी के डायरेक्टर श्री अशोक जैन। उन्होंने कमान संभाली और अपने स्तर पर पूरी व्यवस्था की। श्री जैन के पिताजी श्री पदमचंद जैन की इच्छा के अनुसार अनुराधा पौंडवाल का प्रवास भी उनके जयपुर हाउस स्थित आवास पर कराया गया था।

कार्यक्रम बहुत शानदार रहा। अमर उजाला में इसके कवरेज के लिए तत्कालीन सिटी इंचार्ज श्री एसपी सिंह जी ने मुझे भेजा था। उसके प्रारंभिक कार्यक्रम की कवरेज मैंने फोटो जर्नलिस्ट श्री जगदीश को लिख कर दे दी। बाकी कवरेज में श्री एसपी सिंह जी को फोन पर नोट करा दी। अब बारी थी इंटरव्यू की। कार्यक्रम सहयोगी डा.मधुरिमा शर्मा व श्री अशोक जैन ने इंटरव्यू की व्यवस्था की। टेंट में पीछे ग्रीन रूम तो था नहीं, पीछे टैंट में तख्त पर ही उनका इंटरव्यू लिया।इस दौरान वरिष्ठ चित्रकार प्रो अश्विनी शर्मा भी मौजूद थे।
इसके बाद अनुराधा जी व कविता जी कई बार आगरा आईं और उनका कवरेज किया, साक्षात्कार लिए, लेकिन यह पहला साक्षात्कार हमेशा याद रहेगा।कविता पोंडवाल ने कमलानगर की जनकपुरी में मेरे द्वारा संपादित स्मारिका जन जन के प्रभु श्री राम का विमोचन 2013 में किया था।
 
अनुराधा जी ने बातचीत के दौरान बताया कि उन्होंने कभी संगीत नहीं सीखा। यह ऐसी कला है जो किसी के सिखाने से नहीं आती। खुद को समर्पित होना पड़ता है। इसे संवारने के लिए रात-दिन अभ्यास करना पड़ता है, तब जाकर मंजिल के करीब पहुंचते हैं। मैं आज भी उसी तरह अभ्यास करती हूं जैसा शुरुआती दौर में करती थी।

एक प्रश्न के जबाव में उन्होंने बताया था कि कार्यक्रम कैसा भी हो छोटा या बड़ा, तैयारी पूरी गंभीरता से करती हूं। मुझे तो हर जगह मेरा सर्वश्रेष्ठ ही कार्यक्रम देना है। मैंने टेक्नोलॉजी को खुद पर हावी नहीं होने दिया। आज के दौर में ज्यादातर सिंगर सिर्फ टेक्नोलॉजी की बदौलत ही चलते हैं। टेक्नोलॉजी के भरोसे आप ज्यादा समय तक नहीं चल सकते। उनका कहना था कि संगीत सिर्फ पेशा ही नहीं बल्कि मेरी जीवन शैली है। मेरी रुह है, मेरी आत्मा है। मुझे गज़ल गाने में थोड़ी झिझक होती है पर गीत और भजन गाना ज्यादा पसंद है।

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*श्री अशोक जैन (डॉकटर सोप  ) को श्रद्धांजलि*

इस कार्यक्रम में सहयोगी रहे श्री अशोक जैन का निधन अभी हाल ही में हो गया। दो दशकों में उनसे कार्यक्रमों में कई बार मुलाकात हुई। फिल्म प्रोड्यूसर श्री रंजीत सामा के सभी कार्यक्रमों में वे मिल जाते थे। बहुत ही मिलनसार व्यक्ति थे। कोरोना काल से पहले इन्क्रडेबिल इंडिया फाउंडेशन की एक मीटिंग में उनसे अंतिम मुकालात हुई थी। उन्हें मैं श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
अनुराधा पौंडवाल के इकलौते पुत्र आदित्य पौंडवाल का भी पिछले दिनों निधन हो गया। उन्हें भी मैं श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।   

----आदर्श नंदन गुप्त

ताज के साये में पग घुघुरु बांध हेमामालिनी मीरा बन नाची


संसमरण 10
ताजमहल के साये में पग घुंघुरू बांध हेमामालिनी मीरा बन नाची 

आदर्श नंदन गुप्त, आगराः अनुपम सौंदर्यशाली ताजमहल, उसके साये में महताब बाग, वहां मीरा बनकर स्वप्न सुंदरी हेमामालिनी ने जब नृत्य किया तो दर्शकों विश्वास ही नहीं हो रहा था कि शोले फिल्म का बसंती, अपनी इस प्रकार की अनूठी प्रस्तुति देंगी, जिसमें सभी श्रद्धाभक्ति में डूब जाएंगे।

विख्यात सिने तारिका हेमामालिनी का आज शनिवार को जन्मदिन है। ताजनगर के वासी उनके दीर्घजीवन की कामना कर रहे हैं। हेमामालिनी फिल्मों की शूटिंग के सिलसिले में कई बार आगरा आई होंगी, लेकिन वर्ष 1994 में ताजमहल के पीछे महताब बाग में मीरा नृत्य नाटिका की प्रस्तुति हेमा ने दी थी। उस समय तक हेमा का राजनीति के दूर-दूर तक नाता नहीं था। हम लोग जब गए तो वह बहुत ही सहज भाव के साथ स्वयं ही मंच की सज्जा करा रही थीं। 
इस मशहूर अभिनेत्री के अभिनय को लोगों ने रुपहले पर्दे पर तो कई बार देखा, लेकिन उनका यहां दूसरा रूप था। हेमामालिनी की मीरा के रूप, रस, रंग एवं विरह की अलग-अलग मुद्राओं को दर्शक अपलक निहारते रहे। करीब ढाई घंटे तक- मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई, जा के सिर मोर-मुकट मेरो पति सोई...। छाड़ि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई  आदि मीरा से जुड़े गीत-भजनों पर नृत्य किए। हेमामालिनी उसके कई साल बाद राजनीति में आ गई। चुनाव प्रचार के लिए उनका कई बार यहां आना हुआ।

हरि सत्संग समिति ने नवंबर, 2012 में
फतेहाबाद रोड एक मैदान पर नृत्य नाटिका रामायण का मंचन किया। उसमें उनका अलग ही रूप निखर कर आया था। समिति के संजय गोयल ने बताया कि यह कार्यक्रम तीन घंटे तक चला था।
लीडर्स आगरा का वार्षिक समारोह 2018 को हुआ था, उसमें वे मुख्य अतिथि थीं। समिति के अध्यक्ष सुनील जैन ने बताया कि हेमामालिनी ने शहर की कई शख्सियतों को सम्मानित किया था। हरिसत्संग समिति और लीडर्स आगरा के पदाधिकारियों ने हेमामालिनी के जन्मदिवस पर उनके दीर्घजीवन की कामना की है।

Sunday, October 11, 2020

ताज महल के प्रति दीवानगी थी अमिताभ बच्चन में

अमिताभ से तीन मुलाकात, हर बार दिखे जोश से लवरेज

कुछ विभूतियों को तो जैसे भगवान ने खासतौर पर इस धरती पर भेजा है उनमें से एक शहनशाह अमिताभ बच्चन भी है। जब भी मुलाकात हुई, उनके चेहरे पर चमक दिखी, सदैव जोश से लबरेज़ दिखे, जब चलते हुए देखा तो वास्तव में लगा कि कोई शहंशाह चल रहा है। 
पहली बार अमिताभ से मेरी मुलाकात वर्ष 2005 में हुई। मेहताब बाग में बंटी और बबली की शूटिंग में हुई। चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था के बाबजूद में वहां कवरेज के लिए पहुंच गया। लंबे लंबे डग भरते हुए जब उन्हें आपने सामने से गुजरते हुए देखा, तो लगा कि कोई महामानव चला जा रहा है।
शाम को एक पंचतारा होटल में पहुँचे, वहां उनके साथ अमर सिंह और फ़िल्म निर्देशक भी थे। हम लोगो के साथ भाई अमी आधार निडर थे। हम सबसे लंबी बातचीत उस दौरान हुई।
🌸वर्ष 2007 में सूत्रों से पता चला कि अमिताभ बच्चन होटल अमर विलास में आए हुए है। फिर क्या था, वहां डेरा डाल दिया। वे यहाँ ऐश्वर्य राय का जन्मदिन मनाने आए थे। उनके साथ तब अमर सिंह, अभिषेक बच्चन,जया बच्चन, ऐश्वर्या थे। तब मेरे पास छोटा सा कैमरा भी था, जिससे मेने इन सबकी छोटी सी वीडियो बनाई थी।

🌸20 अक्टूबर 2009 को मैक्स    विजय कार्यक्रम तारघर मैदान  में हुआ । जिसमें कई लोगो का सम्मान किया गया था।उसके बाद एक होटल में प्रेस वार्ता हुई थी।
 🌸दादा साहब फाल्के अवार्ड किसी को यू ही नही मिल जाता। अमिताभ इस लायक है। वे इस सदी के महानायक हैं। उंन्हे यह मिल रहा है, उसके लिए उंन्हे बधाई।
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21 अक्टूबर 2009 को मैक्स  विजय कार्यक्रम तारघर मैदान, शहजादी मंडी  में हुआ, जिसमें कई शख्सितयों को उन्होंने सम्मानित किया गया था।शाम को उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा था इनाम और खिताबों को ज्यादा अहमियत नहीं देते। बीबीसी ने एक बार इंटरनेट पर वोटिंग कराई थी, जिसमें उन्हें बालीवुड के महानायक का खिताब दे दिया था, लेकिन मैं अपने बाबूजी (कवि हरिवंश राय बच्चन) के पद चिन्हों पर ही चल कर समाज के काम आना चाहता हूं। अभिषेक व एश्वर्या से भी उम्मीद है कि वे भी बाबूजी के बताए रास्ते पर चलेंगे। बंटी और बबली फिल्म की शूटिंग के दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि पुरानी फिल्म रेशमा और शेरा की शूटिंग भी यहां हुई थी। उनके साथ राखी भी थीं। छात्र जीवन की याद करते हुए उन्होंने पत्रकारों को बताया था कि कालेज में पढने के बाद वे नौकरी की तलाश में भी रहे, लेकिन सफल नहीं हुए। इसके बाद आल इंडिया रेडियो में भी कुछ साल तक काम किया था।
 विज्ञापन यूपी में दम है, क्योंकि यहां जुर्म कम है की शूटिंग आगरा और फतेहपुर सीकरी में हुई थी, तब भी अमिताभ आगरा आए थे।

Saturday, October 10, 2020

क्रांतिकारियों की भाभी थी दुर्गा

संस्मरण 8(   जयंती 7 अक्टूबर)

क्रांतिकारियों की भाभी दुर्गाः जिनके लिए बम और रिवाल्वर खिलौने थे

चित्र में दिखाई दे रहीं बहुत ही सहज, सरल सी दिखने वाली बुजुर्ग महिला के बारे में किसी को भी सहज विश्वास नहीं होगा कि क्रांतिकारियों की यह परम श्रद्धेय दुर्गा भाभी हैं, वे बम और रिवाल्वर को खिलौना समझती थीं। सात अक्टूबर को इनका जन्मदिन है।

कोलकाता के अधिवेशन में अमर शहीद भगत सिंह को बचा कर ले जाने में इनकी प्रमुख भूमिका थी। भगत सिंह हैट लगाकर अंग्रेज जैसे थे, दुर्गा भाभी उनकी पत्नी और अमर शहीद राजगुरु उनके नौकर बने थे। क्रांतिकारियों के मास्टर माइंड क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की पत्नी थीं। भाभी बम बनाने में भी एक्सपर्ट थीं। असेंबली बम कांड के बाद भगत सिंह आदि क्रांतिकारी गिरफ्तार हो गए थे। दुर्गा जी ने उन्हें छुड़ाने के लिए वकील को पैसे देने के लिए सारे गहने बेच तीन हजार रुपए दिए थे। एक बम बनाते समय इनके पति भगवती चरण बोहरा जी चिथड़े उड़ गए थे।

शहीदों की अर्धशताब्दी समारोह का आयोजन जब

आगरा में हुआ तब, वे क्रांतिकारी, इतिहासकार श्रीमन्मथनाथ गुप्त, भगत सिंह के साथी क्रांतिकारी श्री शिव वर्मा, क्रांतिकारी श्री जयदेव कपूर के साथ दुर्गा भाभी भी थीं। उसके बाद 6 अक्टूबर 1985 को जब क्रांतिकारी शिव वर्मा जी का नागरिक अभिनंदन सरदार भगत सिंह शहीद स्मारक समिति ने किया, तब भी दुर्गा भाभी जी आईं थी। तब मुझे उनका सम्मान करने का मौका मिला। उसके बाद ले कई बार आगरा आईं और मुझे उनके साक्षात्कार का मौका मिला।

मेरे पूज्य पिताजी स्वाधीनता सेनानी स्व.रोशनलाल करुणेश से उनका परिचय था। उन्होंने लखनऊ के मांटेसरी स्कूल खोला था, जो आज भी संचालित है। उनसे लगातार पत्राचार होता रहता था। दुर्गा भाभी सहित इन सभी क्रांतिकारियों ने अभिनंदन ग्रंथ में पिताजी के बारे में भी विचार लिखे थे।

मैं जब भी दुर्गा भाभी जी क्रांतिकारी जीवन पर विचार करता हूं तो मेरा मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है। उनसे मुलाकात के क्षण याद आते ही मैं रोमांचित हो उठता हूं।

(चित्र में क्रांतिकारी श्रद्धेय दुर्गा भाभी जी को माल्यार्पण करता हुआ मैं, 6 अक्टूबर 1985, क्रांतिकारी शिव वर्मा अभिनंदन समारोह)